Script — Devanagari
षष्ठ:पाठ:-मन:पूतं समाचरेत्
महाकवि कालिदास के मालविकाग्निमित्रम् के प्रसिद्ध श्लोक "पुराणमित्येव न साधु सर्वम्…" का सन्धि-विच्छेद, शब्दार्थ, हिन्दी अर्थ, भावार्थ एवं मुख्य शिक्षा सरल भाषा में।
2 min read
मालविकाग्निमित्रम् (श्लोक ७) — सन्धि-विच्छेद, शब्दार्थ एवं भावार्थ
महाकविः — कालिदासः ग्रन्थः — मालविकाग्निमित्रम् श्लोकः — ७
मूलश्लोक
पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्। सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः॥
सन्धि-विच्छेद पुराणमित्येव = पुराणम् + इति + एव चापि = च + अपि नवमित्यवद्यम् = नवम् + इति + अवद्यम् परीक्ष्यान्यतरत् = परीक्ष्य + अन्यतरत् परप्रत्ययनेयबुद्धिः = पर + प्रत्यय + नेय + बुद्धिः शब्दार्थ पुराणम् — पुराना इति — ऐसा एव — ही न — नहीं साधु — उत्तम, अच्छा सर्वम् — सब च — और अपि — भी काव्यम् — काव्य, साहित्य नवम् — नया अवद्यम् — निन्दनीय सन्तः — सज्जन परीक्ष्य — परखकर अन्यतरत् — दोनों में से जो श्रेष्ठ हो भजन्ते — ग्रहण करते हैं मूढः — मूर्ख परप्रत्ययनेयबुद्धिः — दूसरों की राय से चलने वाली बुद्धि वाला व्यक्ति हिन्दी अर्थ
केवल पुराना होने के कारण प्रत्येक वस्तु अच्छी नहीं होती और केवल नया होने के कारण प्रत्येक काव्य निन्दनीय भी नहीं होता। सज्जन लोग पुरानी और नई दोनों वस्तुओं की भली-भाँति परीक्षा करके जो श्रेष्ठ होती है, उसी को स्वीकार करते हैं। परन्तु मूर्ख व्यक्ति अपनी बुद्धि का प्रयोग नहीं करता, बल्कि दूसरों की राय के अनुसार ही चलता है।
भावार्थ
महाकवि कालिदास इस श्लोक में विवेकपूर्ण निर्णय लेने की शिक्षा देते हैं। किसी वस्तु, विचार या साहित्य का मूल्य केवल उसके पुराने अथवा नए होने के आधार पर नहीं आँकना चाहिए। बुद्धिमान व्यक्ति निष्पक्ष रूप से गुण-दोषों की परीक्षा करता है और जो श्रेष्ठ होता है, उसे स्वीकार करता है। इसके विपरीत, मूर्ख व्यक्ति बिना सोचे-समझे दूसरों की बातों पर विश्वास कर लेता है।
मुख्य शिक्षा केवल पुराना होने से कोई वस्तु श्रेष्ठ नहीं हो जाती। केवल नया होने से कोई वस्तु दोषपूर्ण नहीं होती। प्रत्येक विषय में विवेकपूर्वक परीक्षण करना चाहिए। दूसरों के मत का अन्धानुकरण नहीं करना चाहिए। सत्य, गुण और उपयोगिता के आधार पर निर्णय लेना ही बुद्धिमानी है।